शंकराचार्य विवाद पर सियासी-संतों की जंग तेज: उमा बोलीं- सबूत मांगकर प्रशासन ने मर्यादा तोड़ी, परमहंस ने NSA की मांग की

प्रयागराज: में माघ मेला प्रशासन और ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच चल रहा विवाद अब सरकार और संत समाज के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। बीते 10 दिनों से चला आ रहा यह विवाद थमने के बजाय और गहराता जा रहा है। अब इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ और फायरब्रांड नेता उमा भारती भी खुलकर शंकराचार्य के समर्थन में सामने आ गई हैं।

उमा भारती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बयान जारी करते हुए कहा कि प्रशासन द्वारा शंकराचार्य होने का सबूत मांगना मर्यादाओं और अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य की मान्यता तय करने का अधिकार केवल शंकराचार्य परंपरा और विद्वत परिषद को है, न कि प्रशासनिक अधिकारियों को। उन्होंने उम्मीद जताई कि उत्तर प्रदेश सरकार और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच सकारात्मक समाधान निकलेगा।


शंकराचार्य का सरकार पर तीखा हमला

बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे और बाद में उनके निलंबन के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार पर अपने हमले और तेज कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा लड़ाई हिंदू-मुसलमान या अंग्रेज-भारतीय की नहीं, बल्कि नकली और असली हिंदू के बीच है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दावा किया कि सिटी मजिस्ट्रेट से उनकी फोन पर बात हुई थी, जिसमें अधिकारी ने कहा कि अत्याचारी सरकार का अंग बने रहना पाप है और इसी कारण उनके लिए प्रशासनिक पद पर काम करना कठिन हो गया था।


परमहंस महाराज की तीखी टिप्पणी, NSA लगाने की मांग

इधर, अयोध्या छावनी धाम के परमहंस महाराज ने शंकराचार्य और सतुआ बाबा पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि दोनों ने माघ मेले की गरिमा को ठेस पहुंचाई है और इन्हें माघ मेले में आने से पूरी तरह प्रतिबंधित कर देना चाहिए।

परमहंस महाराज ने यहां तक कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया जाना चाहिए। उनके इस बयान के बाद संत समाज में मतभेद और अधिक गहरे हो गए हैं।


विवाद की शुरुआत कैसे हुई

इस पूरे विवाद की शुरुआत 18 जनवरी को हुई, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में सवार होकर स्नान के लिए जा रहे थे। पुलिस ने उन्हें रोकते हुए पैदल जाने को कहा, जिसका विरोध करने पर शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट की गई।

इसके बाद माघ मेला प्रशासन की ओर से दो नोटिस जारी किए गए। पहले नोटिस में शंकराचार्य की पदवी लिखने पर सवाल उठाया गया, जबकि दूसरे नोटिस में मौनी अमावस्या के दिन कथित हंगामे को लेकर जवाब मांगा गया। प्रशासन ने चेतावनी दी कि नियमों का उल्लंघन करने पर माघ मेले से प्रतिबंध लगाया जा सकता है। शंकराचार्य ने दोनों नोटिसों का जवाब दे दिया है।


वकील और संत समाज भी समर्थन में उतरे

प्रयागराज हाईकोर्ट के वकील भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में सामने आए हैं। उन्होंने पोस्टर जारी कर कहा कि असहमति हो सकती है, लेकिन अपमान स्वीकार नहीं किया जाएगा।

मंगलवार को माघ मेले में कंप्यूटर बाबा सहित कई संत शंकराचार्य के समर्थन में धूनी साधना में बैठे और उनके पक्ष में नारेबाजी की गई।


अन्य संतों और नेताओं की प्रतिक्रियाएं

श्रृंगवेरपुर धाम के पीठाधीश्वर शांडिल्य महाराज ने कहा कि माघ मेला एक तीर्थ क्षेत्र है, राजनीति का अखाड़ा नहीं। उन्होंने प्रशासन की कार्रवाई को गलत बताया, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ की गई अभद्र टिप्पणियों की निंदा भी की।

वहीं, दिनेश फलाहारी महाराज ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को खून से पत्र लिखकर शंकराचार्य को सम्मान के साथ गंगा स्नान कराने की व्यवस्था करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों द्वारा साधु-संतों का अपमान वीडियो में स्पष्ट नजर आ रहा है और इसके लिए प्रशासन को माफी मांगनी चाहिए।


निष्कर्ष:

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और माघ मेला प्रशासन के बीच शुरू हुआ विवाद अब केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक रूप भी ले चुका है। उमा भारती जैसे वरिष्ठ नेताओं के समर्थन और परमहंस महाराज जैसे संतों की तीखी टिप्पणियों से मामला और संवेदनशील हो गया है। आने वाले दिनों में सरकार इस विवाद को कैसे सुलझाती है, इस पर पूरे देश की नजर बनी हुई है।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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