“जेलों में सड़ रहे लोग…” सुप्रीम कोर्ट जज की तीखी टिप्पणी, बोले- न्यायपालिका जरूरत से ज्यादा सख्त

नई दिल्ली/बेंगलुरु: से आई एक महत्वपूर्ण टिप्पणी ने देश की न्याय प्रणाली पर गंभीर बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा है कि न्यायपालिका के कुछ हिस्से “मोर लॉयल देन द किंग” सिंड्रोम से ग्रस्त हो गए हैं, जिसके चलते आम नागरिकों को अनावश्यक रूप से कठोरता का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इसी वजह से कई लोग महीनों और वर्षों तक जेलों में बिना पर्याप्त कारण के बंद रहते हैं—जो किसी भी “विकसित भारत” के आदर्श के विपरीत है।

यह बयान उन्होंने बेंगलुरु में आयोजित सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पहली राष्ट्रीय समिट में “विकसित भारत में न्यायपालिका की भूमिका” विषय पर बोलते हुए दिया। उनके वक्तव्य को न्यायिक प्रणाली के आत्ममंथन के रूप में देखा जा रहा है।

“जरूरत से ज्यादा सख्ती” पर चिंता

जस्टिस भुइयां ने कहा कि कुछ मामलों में सिस्टम इतनी सख्ती दिखा रहा है कि छोटी-छोटी बातों पर भी आपराधिक केस दर्ज कर दिए जाते हैं। उन्होंने खासतौर पर सोशल मीडिया पोस्ट, विरोध प्रदर्शन और असहमति जैसे मामलों में दर्ज हो रहे केसों पर चिंता जताई। उनके अनुसार, असहमति को अपराध मानना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका को निष्पक्ष और संतुलित रहना चाहिए, न कि किसी भी प्रकार की अति-उत्साही प्रवृत्ति के तहत काम करना चाहिए।

PMLA और UAPA पर बड़ा सवाल

अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) जैसे कड़े कानूनों के उपयोग पर भी गंभीर सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि:

  • PMLA एक महत्वपूर्ण कानून है, लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल इसकी प्रभावशीलता को कम कर देता है।
  • UAPA के तहत दोषसिद्धि दर 5% से भी कम है, फिर भी आरोपी वर्षों तक जेल में बंद रहते हैं।

उनका मानना है कि जब किसी कानून का अत्यधिक उपयोग होता है, तो वह अपनी मूल भावना और प्रभाव खो देता है।

लंबी हिरासत पर सवाल

जस्टिस भुइयां ने कहा कि कई मामलों में आरोपी को बिना पर्याप्त सबूत के लंबे समय तक जेल में रखा जाता है, जो न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन केवल ठोस कारणों पर ही हो।

उन्होंने यह भी बताया कि सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट को विशेष जांच टीम (SIT) बनानी पड़ी, जिससे न्यायिक समय की बर्बादी हुई।

न्यायपालिका और ‘विकसित भारत’ की बहस

अपने भाषण में उन्होंने “विकसित भारत” जैसे राजनीतिक नारों से न्यायपालिका को जोड़ने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि अदालतों को पूरी तरह स्वतंत्र रहना चाहिए और उन्हें किसी भी राजनीतिक विचारधारा या लक्ष्य से प्रभावित नहीं होना चाहिए।

उन्होंने जोर देकर कहा कि एक सच्चे विकसित समाज में बहस, असहमति और विचारों की स्वतंत्रता को स्थान मिलना चाहिए। अगर असहमति को ही अपराध बना दिया जाएगा, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

सामाजिक न्याय पर भी टिप्पणी

जस्टिस भुइयां ने सामाजिक असमानता और भेदभाव पर भी अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि समाज में दलितों के साथ भेदभाव जारी रहेगा, तो विकास का कोई भी मॉडल अधूरा रहेगा।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं, जहां दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार होता है, किसी भी सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हर व्यक्ति के सम्मान और गरिमा की रक्षा करना ही सच्चे विकास का आधार है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह बयान?

एक मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जज द्वारा न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर इतनी खुलकर टिप्पणी करना बेहद अहम माना जा रहा है। यह बयान न केवल न्यायिक प्रणाली की कार्यशैली पर सवाल उठाता है, बल्कि सुधार की जरूरत की ओर भी इशारा करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के विचार न्यायिक सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं।


निष्कर्ष:

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां का यह बयान भारतीय न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी और आत्मनिरीक्षण का अवसर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय केवल कानून लागू करने का नाम नहीं, बल्कि नागरिकों की स्वतंत्रता, सम्मान और अधिकारों की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है। यदि न्यायपालिका संतुलन बनाए रखेगी, तभी “विकसित भारत” का सपना वास्तविकता में बदल सकेगा।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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