दौसा सिलिकोसिस घोटाले में बड़ा खुलासा: एक और सरकारी डॉक्टर गिरफ्तार, 12.39 करोड़ की ठगी का जाल

राजस्थान: के दौसा जिले में सामने आए सिलिकोसिस घोटाले में पुलिस ने एक और बड़ी कार्रवाई करते हुए एक सरकारी डॉक्टर को गिरफ्तार किया है। इस गिरफ्तारी के साथ ही अब तक इस मामले में कुल चार आरोपियों को पकड़ा जा चुका है। मामला फर्जी सिलिकोसिस प्रमाण पत्र बनाकर सरकार को करोड़ों का चूना लगाने से जुड़ा है।

गिरफ्तार आरोपी डॉ. प्रेम कुमार मीना (45) हैं, जो कनिष्ठ विशेषज्ञ (मेडिसिन) के पद पर कार्यरत थे और सिलिकोसिस बोर्ड के सदस्य भी रह चुके हैं। पुलिस के अनुसार, उन्हें मंगलवार रात 8 से 9 बजे के बीच हिरासत में लिया गया और बाद में कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उनके खिलाफ आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा घोटाला सिलिकोसिस जैसी गंभीर बीमारी के फर्जी प्रमाण पत्र जारी करने से जुड़ा है। सिलिकोसिस एक जानलेवा फेफड़ों की बीमारी है, जो आमतौर पर खदानों या धूल भरे वातावरण में काम करने वाले मजदूरों को होती है। सरकार इस बीमारी से पीड़ित लोगों को आर्थिक सहायता देती है।

इसी योजना का फायदा उठाते हुए कुछ डॉक्टरों और कर्मचारियों ने मिलकर फर्जी सर्टिफिकेट जारी किए और सरकारी मुआवजे की रकम हड़प ली। जांच में सामने आया कि 413 फर्जी प्रमाण पत्र जारी कर राज्य सरकार को करीब 12.39 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाया गया।

पहले भी हो चुकी हैं गिरफ्तारियां

इस मामले में इससे पहले 30 मार्च को पुलिस ने तीन अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया था, जिनमें डॉ. मनोज ऊंचवाल, डॉ. डीएन शर्मा और रेडियोग्राफर मनोहर लाल यादव शामिल हैं। इन सभी के खिलाफ 29 जनवरी 2024 को कोतवाली थाने में मामला दर्ज किया गया था।

दौसा में ही सबसे ज्यादा बने फर्जी कार्ड

जांच में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि पूरे प्रदेश में बनाए गए सिलिकोसिस कार्ड में से करीब 46 प्रतिशत अकेले दौसा जिले में बनाए गए थे। नवंबर 2022 से शुरू हुई इस प्रक्रिया के दौरान महज 10 महीनों में 2453 कार्ड जारी किए गए, जिससे अधिकारियों को शक हुआ।

इसके बाद राज्य स्तर पर जांच टीम गठित की गई और जयपुर के एसएमएस मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई गई। इस कमेटी में डॉक्टरों ने विस्तृत जांच कर रिपोर्ट सौंपी, जिसमें बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा सामने आया।

जांच में क्या-क्या खुलासे हुए?

जांच के दौरान यह पाया गया कि जिन लोगों को सिलिकोसिस बीमारी नहीं थी, उन्हें भी प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए। वहीं, कई वास्तविक मरीजों के आवेदन खारिज कर दिए गए, जिससे वे सरकारी सहायता से वंचित रह गए।

सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह था कि एक ही एक्स-रे का कई बार उपयोग कर अलग-अलग लोगों के नाम पर सर्टिफिकेट बनाए गए। इस काम में रेडियोग्राफर और डॉक्टरों की मिलीभगत सामने आई है।

22 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज

इस घोटाले में जिला अस्पताल के पीएमओ की शिकायत पर करौली, चूरू, सीकर, भीलवाड़ा, चौमूं, अलवर और दौसा सहित कई जिलों के कुल 22 डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इनमें से 13 आरोपी केवल दौसा जिले से हैं।

जांच अभी जारी, और गिरफ्तारी संभव

साइबर थाना प्रभारी डीएसपी बृजेश कुमार के अनुसार, यह जांच अभी जारी है और इसमें शामिल अन्य आरोपियों की तलाश की जा रही है। पुलिस का मानना है कि यह घोटाला और भी बड़ा हो सकता है और आने वाले दिनों में कई और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल

इस पूरे मामले ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस बीमारी के नाम पर गरीब मजदूरों को राहत मिलनी चाहिए थी, उसी को कुछ लोगों ने भ्रष्टाचार का जरिया बना लिया।

यह मामला न केवल आर्थिक नुकसान का है, बल्कि उन असली मरीजों के साथ अन्याय भी है, जिन्हें सहायता मिलनी चाहिए थी लेकिन फर्जीवाड़े के कारण वे वंचित रह गए।


निष्कर्ष:

दौसा का सिलिकोसिस घोटाला यह दिखाता है कि जब सिस्टम के अंदर बैठे लोग ही नियमों का दुरुपयोग करते हैं, तो इसका असर सीधे आम जनता पर पड़ता है। हालांकि, पुलिस की लगातार कार्रवाई से यह उम्मीद जरूर जगी है कि इस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश होगा और दोषियों को सख्त सजा मिलेगी।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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