महाराष्ट्र। महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव में नागपुर और पुणे की स्नातक सीटों पर भाजपा को मिली हार ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। नागपुर में कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को शिकस्त दी, जबकि पुणे में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की उम्मीदवार हर्षदा देशमुख ने जीत दर्ज की। इन नतीजों ने भाजपा के उम्मीदवार चयन, संगठनात्मक रणनीति और गठबंधन के भीतर आपसी तालमेल पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नागपुर को भाजपा का पारंपरिक राजनीतिक गढ़ माना जाता है। यह मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का भी प्रमुख केंद्र है। वहीं पुणे में शिक्षण संस्थानों और भाजपा के मजबूत संगठनात्मक आधार के बावजूद पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।
नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले को 3,271 वोटों से हराया। लंबी मतगणना के बाद वंजारी को 67,231 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार के खाते में 63,960 वोट आए।
खास बात यह रही कि शुरुआती वरीयता मतों में भाजपा उम्मीदवार आगे थे, लेकिन अंतिम परिणाम कांग्रेस के पक्ष में रहा। वहीं पुणे स्नातक सीट पर भाजपा की स्मिता जाधव को हर्षदा देशमुख ने हराया।
भाजपा चुनाव लड़ी गई तीन सीटों में से केवल पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जीत दर्ज कर सकी।
नागपुर में भाजपा की हार की प्रमुख वजहों में उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष को भी देखा जा रहा है। भाजपा ने पूर्व विधान परिषद सदस्य सोले की जगह सुधाकर कोहले को टिकट दिया था। इससे नाराज होकर सोले निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतर गए।
हालांकि बाद में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात के बाद उन्होंने कोहले का समर्थन करने की बात कही, लेकिन नामांकन वापसी की समयसीमा समाप्त होने के कारण उनका नाम मतपत्र पर बना रहा।
इसके अलावा निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले को मिले 24,249 वोटों ने भी मुकाबले को प्रभावित किया। भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले ने आरोप लगाया कि कराले की उम्मीदवारी से भाजपा को नुकसान हुआ।
पुणे में भी उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टी के अंदर सवाल उठे। स्थानीय नेतृत्व से उम्मीदवार नहीं चुने जाने को लेकर कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराजगी की चर्चा सामने आई।
चुनावी नतीजों के बाद भाजपा के भीतर प्रचार रणनीति की समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही है। पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं के मुताबिक, पहले स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनावों में कार्यकर्ता पंजीकृत मतदाताओं से सीधे संपर्क करते थे। मतदान प्रक्रिया की जानकारी देने के साथ उन्हें मतदान केंद्र तक पहुंचने के लिए भी प्रेरित किया जाता था।
इस बार जमीनी स्तर पर ऐसी सक्रियता कम दिखाई देने की बात कही गई है।
दूसरी ओर, कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने स्नातक मतदाताओं, शिक्षकों, प्रोफेसरों, कर्मचारी संगठनों और विभिन्न पेशेवर समूहों के साथ सीधे संवाद को अपनी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
नागपुर चुनाव में वरीयता आधारित मतदान प्रणाली ने अहम भूमिका निभाई। शुरुआती मतगणना में सुधाकर कोहले को 60,924 पहली वरीयता के वोट मिले, जबकि अभिजीत वंजारी को 56,630 वोट प्राप्त हुए।
हालांकि, कोई भी उम्मीदवार जीत के लिए निर्धारित 75,438 वोटों का कोटा हासिल नहीं कर सका। इसके बाद आगे की वरीयताओं और मतगणना के विभिन्न चरणों के आधार पर अंतिम परिणाम घोषित हुआ।
मतगणना में 15,032 वोट अमान्य घोषित किए गए। अंततः अभिजीत वंजारी 67,231 वोट हासिल कर विजयी रहे।
भाजपा उम्मीदवार ने बड़ी संख्या में वोट अमान्य होने पर सवाल उठाए और दावा किया कि दूसरी वरीयता दर्ज करने में हुई गलतियों ने चुनाव परिणाम को प्रभावित किया।
महाराष्ट्र में NEET पेपर लीक के आरोपों, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और सरकारी भर्तियों को लेकर युवाओं के बीच नाराजगी भी चुनावी चर्चा का हिस्सा रही।
परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार की मांग को लेकर विभिन्न छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किए हैं।
इन परिस्थितियों में स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं के रुख को लेकर राजनीतिक विश्लेषण भी तेज हो गया है। हालांकि, चुनाव परिणामों में इन मुद्दों की वास्तविक भूमिका कितनी रही, इसका स्पष्ट आकलन करना मुश्किल है।
नागपुर और पुणे में भाजपा की हार के बाद सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के भीतर भी मतभेद सामने आए हैं।
भाजपा प्रवक्ता नवनाथ बन ने आरोप लगाया कि गठबंधन के सहयोगियों, विशेषकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने दोनों सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों का अपेक्षित समर्थन नहीं किया।
इस बयान पर शिवसेना नेताओं ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि गठबंधन सहयोगियों को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। पार्टी के एक मंत्री ने चुनाव के दौरान सहयोग सुनिश्चित करने के लिए गठबंधन की समन्वय समिति की भूमिका पर भी सवाल उठाए।
नागपुर और पुणे के नतीजों ने भाजपा के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। उम्मीदवार चयन, स्थानीय नेतृत्व की नाराजगी, मतदाताओं से सीधा संपर्क और गठबंधन सहयोगियों के साथ समन्वय जैसे मुद्दों पर पार्टी को समीक्षा करनी पड़ सकती है।
अब देखना होगा कि भाजपा इन चुनावी नतीजों से क्या सबक लेती है और आगामी राजनीतिक गतिविधियों में अपनी रणनीति में किस तरह बदलाव करती है।
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