इन पांच शहरों के कुल 510 वार्डों में दोनों पार्टियों की ओर से उतारे गए उम्मीदवारों में 13.72 प्रतिशत Gen Z उम्मीदवार हैं। यानी दोनों प्रमुख दलों ने युवा मतदाताओं को साधने के साथ-साथ संगठन में नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाई है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो युवा उम्मीदवारों को टिकट देने के मामले में कांग्रेस भाजपा से आगे है। कांग्रेस ने 49 Gen Z उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जबकि भाजपा ने 21 युवाओं को टिकट दिया है।
जयपुर नगर निगम के 150 वार्डों में कांग्रेस ने 12 Gen Z उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि भाजपा के 6 युवा उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं।
भाजपा की सबसे युवा प्रत्याशी पलक यादव हैं, जिनकी उम्र 21 साल है और वे वार्ड-10 से चुनाव लड़ रही हैं। वहीं कांग्रेस की ओर से वार्ड-71 से फैज हसन 21 साल की उम्र में चुनाव मैदान में हैं।
जोधपुर में भाजपा और कांग्रेस ने मिलकर 17 Gen Z उम्मीदवार उतारे हैं। इनमें कांग्रेस के 10 और भाजपा के 7 उम्मीदवार शामिल हैं।
कांग्रेस की सबसे युवा प्रत्याशी सरस्वती हैं, जो वार्ड-51 से चुनाव लड़ रही हैं। उन्होंने 2025 में ग्रेजुएशन पूरा किया है और आगे की पढ़ाई कर रही हैं। भाजपा ने वार्ड-24 से 24 वर्षीय भाग्यश्री आचार्य को टिकट दिया है। भाग्यश्री एमए की पढ़ाई कर रही हैं और पहली बार चुनाव मैदान में हैं।
उदयपुर नगर निगम में दोनों दलों ने कुल 8 Gen Z उम्मीदवार उतारे हैं। इनमें कांग्रेस के 6 और भाजपा के 2 प्रत्याशी हैं। भाजपा की 26 वर्षीय प्रज्ञा पाटीदार वार्ड-38 से चुनाव लड़ रही हैं। वे इंटीरियर डिजाइनर हैं और सामाजिक एवं स्वयंसेवी गतिविधियों से भी जुड़ी हैं।
अजमेर में कुल 9 युवा उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें भाजपा के 4 और कांग्रेस के 5 उम्मीदवार शामिल हैं।
इन पांच शहरों में कोटा Gen Z उम्मीदवारों के मामले में सबसे आगे है। यहां भाजपा ने 2 और कांग्रेस ने 16 युवा उम्मीदवारों को टिकट दिया है। यानी कोटा में कुल 18 Gen Z उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं।
हालांकि दोनों पार्टियों ने युवाओं को बड़ी संख्या में मौका दिया है, लेकिन पूरी तरह पुराने चेहरों से दूरी नहीं बनाई गई है। भाजपा और कांग्रेस ने कई 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के अनुभवी उम्मीदवारों को भी मैदान में उतारा है।
इससे साफ है कि दोनों दल चुनावी मैदान में युवा जोश और राजनीतिक अनुभव का संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
नगरीय निकाय चुनाव में युवाओं की बड़ी हिस्सेदारी को राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 21 साल की उम्र पूरी कर चुके योग्य युवा पार्षद का चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसे में दोनों प्रमुख दलों द्वारा बड़ी संख्या में युवा चेहरों को टिकट देना युवा मतदाताओं को आकर्षित करने और स्थानीय राजनीति में नई पीढ़ी को आगे लाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
अब असली परीक्षा चुनाव परिणाम में होगी। देखना होगा कि इन 70 युवा उम्मीदवारों में से कितने जीतकर स्थानीय राजनीति में अपनी जगह बना पाते हैं और क्या Gen Z का यह दांव आने वाले समय में राजस्थान की राजनीति की दिशा को प्रभावित करता है।
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